जब संगठन का बढ़ना ही सफलता लगने लगे
हर संगठन के सफर में एक ऐसा समय आता है, जब बढ़ना ही सफलता जैसा लगने लगता है। नया फंड मिल गया। कोई CSR पार्टनर काम में दिलचस्पी लेने लगा। किसी दूसरे जिले में काम शुरू करने का मौका मिल गया। नया प्रोग्राम शुरू हो रहा है। टीम बढ़ रही है, बजट बढ़ रहा है और बाहर से देखने पर लगता है कि संगठन अच्छी तरह आगे बढ़ रहा है।
हम अक्सर इसे ही प्रगति मान लेते हैं। ज्यादा फंडिंग का मतलब ज्यादा लोगों तक पहुंच और ज्यादा प्रोग्राम, इसलिए यह अपने आप में अच्छी बात लगती है। लेकिन इस भागदौड़ में संगठन के अंदर की कुछ जरूरी चीजें पीछे छूट जाती हैं।
गवर्नेंस, दस्तावेज, पैसों को संभालने की व्यवस्था, काम करने के साफ तरीके जैसी चीजों पर उतना ध्यान नहीं जाता। ऐसा जरूरी नहीं कि संगठन जानबूझकर इन्हें “बाद में देखेंगे, जब बड़े हो जाएंगे” कहकर टाल रहा हो। कई बार इन चीजों के बारे में शुरुआत से ही सोचने का मौका नहीं मिलता।
फंडिंग संगठन को मजबूत नहीं बनाती, वह जो पहले से है उसे और बड़ा कर देती है
कुछ संगठन बढ़ने के साथ मजबूत होते जाते हैं, जबकि कुछ संगठन बढ़ते-बढ़ते और कमजोर हो जाते हैं। फर्क सिर्फ इस बात से नहीं पड़ता कि उन्हें कितना फंड मिला या वे कितने प्रोग्राम चला रहे हैं। असल सवाल है: क्या संगठन के पास बढ़ते काम को संभालने की तैयारी थी?
फंडिंग अपने आप किसी संगठन की समस्याएं ठीक नहीं करती। वह संगठन में पहले से जो चीजें हैं, उन्हें और बड़ा कर देती है। अगर नेतृत्व अच्छा है और सिस्टम ठीक हैं, तो फंडिंग संगठन को और आगे बढ़ने में मदद करती है। संगठन के साथ-साथ उसके सिस्टम और टीम भी मजबूत होते जाते हैं। लेकिन अगर संगठन के अंदर पहले से ही कमजोरियां हैं, तो ज्यादा फंडिंग उन कमजोरियों को भी बड़ा कर सकती है।
जैसे किसी पौधे को पानी देना जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है।
जिन संगठनों को फंडिंग की सबसे ज्यादा जरूरत है
छोटे और जमीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों के साथ समय बिताने पर यह फर्क और साफ दिखता है। कई संगठनों ने सालों तक अपने समुदायों के साथ काम करके भरोसा बनाया है। उनका काम अच्छा है और लोग उन पर भरोसा करते हैं। लेकिन उसी संगठन में काम करने के तरीके लिखे हुए नहीं होते। पैसों को संभालने का सिस्टम कमजोर हो सकता है। गवर्नेंस की जिम्मेदारियां साफ नहीं होतीं। और कई बार संस्थापक ही लगभग हर जरूरी फैसला और हर बड़ा रिश्ता खुद संभाल रहा होता है। आज के काम के लिए शायद यह बड़ी समस्या न लगे।
लेकिन जैसे ही संगठन बढ़ता है, यही चीजें परेशानी बनने लगती हैं। यही सबसे बड़ी विडंबना है। जिन संगठनों को फंडिंग की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, कई बार वही संगठन उस फंडिंग को तेजी से संभालने के लिए सबसे कम तैयार होते हैं। उनसे कहा जाता है कि वे अपना काम बढ़ाएं, ज्यादा लोगों तक पहुंचें और बड़े फंड संभालें। लेकिन संगठन को अंदर से मजबूत करने के लिए उनके पास समय और पैसे दोनों कम होते हैं।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए: “क्या इस प्रोग्राम को फंडिंग की जरूरत है?” सवाल यह भी होना चाहिए: “इस प्रोग्राम को मजबूत बनाने के लिए संगठन को और क्या चाहिए?” कभी जवाब ज्यादा प्रोग्राम फंडिंग होगा। लेकिन कभी जवाब होगा बेहतर वित्तीय सिस्टम, मजबूत टीम, काम करने के साफ तरीके या संगठन को मजबूत बनाने में निवेश।
मजबूत संगठन वही है जो सफलता को भी संभाल सके
संगठन की मजबूती का मतलब सिर्फ मुश्किल समय से निकल जाना नहीं है। कई बार असली परीक्षा तब होती है, जब संगठन के लिए चीजें अच्छी चल रही हों। क्योंकि सफलता भी अपने साथ नई जिम्मेदारियां लेकर आती है। नया फंडर आया तो नई रिपोर्टिंग करनी होगी। नया प्रोग्राम शुरू हुआ तो काम बढ़ेगा। टीम में नए लोग आएंगे तो उनके बीच तालमेल की जरूरत होगी। जैसे-जैसे संगठन बढ़ता है, काम के अलग-अलग हिस्से भी एक-दूसरे से ज्यादा जुड़ते जाते हैं। इसलिए संगठन की मजबूती सिर्फ बैंक में रखे पैसों या मुश्किल समय के लिए बनाई गई योजना से नहीं आती। यह कई छोटी-बड़ी चीजों से मिलकर बनती है।
वे चीजें जो संगठन को मजबूत बनाती हैं
सबसे पहले जरूरी है कि संगठन को खुद पता हो कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है। अगर यह साफ नहीं है, तो संगठन हर नए मौके के पीछे भाग सकता है। एक प्रोग्राम मिला तो उसे शुरू कर दिया, एक फंडर मिला तो उसके हिसाब से काम बदल दिया। धीरे-धीरे संगठन की दिशा ही धुंधली हो सकती है। लेकिन सिर्फ दिशा साफ होना काफी नहीं है। लोग भी जरूरी हैं।
एक अच्छे नेता की असली परीक्षा तब होती है, जब वह अपनी टीम को भी फैसले लेने की जिम्मेदारी देता है। सिर्फ काम बांटना काफी नहीं है। टीम को फैसले लेने का मौका देना, भरोसा करना और उन्हें अपनी समझ बनाने देना भी जरूरी है। अगर हर छोटा-बड़ा फैसला संस्थापक को ही लेना पड़े, तो एक समय के बाद संस्थापक ही संगठन की आगे बढ़ने की सीमा बन सकता है।
जब टीम के लोग बार-बार जिम्मेदारी लेते हैं और साथ मिलकर फैसले करते हैं, तो धीरे-धीरे संगठन की अपनी संस्कृति बनती है। फिर हर चीज इस पर निर्भर नहीं रहती कि संस्थापक क्या करता है। टीम को पता होता है कि संगठन में क्या जरूरी है, फैसले कैसे लिए जाते हैं और मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ कैसे काम करना है। और जब यह लंबे समय तक चलता है, तो संगठन एक मजबूत संस्था बनना शुरू करता है। संगठन का ज्ञान और जरूरी रिश्ते सिर्फ एक व्यक्ति के पास नहीं रहते। वे टीम, काम करने के तरीकों और सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं। फिर संगठन में ऐसे और लोग होते हैं जो उसके काम को आगे ले जा सकते हैं।
इसके बाद आते हैं सिस्टम। काम को लिखकर रखना, किसकी क्या जिम्मेदारी है यह साफ करना, पैसों को सही तरीके से संभालना और टीम के बीच तालमेल रखना। ये चीजें सुनने में शायद बहुत रोमांचक न लगें, लेकिन संगठन को चलाने के लिए बेहद जरूरी हैं। अच्छे सिस्टम होने का मतलब है कि संगठन हर काम के लिए किसी एक व्यक्ति की याददाश्त या मेहनत पर निर्भर नहीं है। कोई व्यक्ति संगठन छोड़ दे, फंडिंग में बदलाव हो जाए या अचानक कोई समस्या आ जाए, तब भी काम चलता रह सकता है। अच्छी वित्तीय व्यवस्था सिर्फ नियमों का पालन करने के लिए नहीं होती। इससे फंडर, पार्टनर और टीम का भरोसा भी बनता है।
फिर आता है कम्युनिकेशन। संगठन अगर साफ तरीके से बता सकता है कि वह क्या करता है, कैसे करता है और अपने काम से क्या सीख रहा है, तो उसके लिए फंडर, पार्टनर और समुदाय के साथ मजबूत रिश्ते बनाना आसान होता है। और एक और चीज जरूरी है: अपने काम से सीखना। मॉनिटरिंग और इवैल्यूएशन सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि फंडर को रिपोर्ट भेजनी है। अगर संगठन अपने डेटा और अनुभव को सही तरीके से देखता है, तो वह समझ सकता है कि क्या काम कर रहा है, क्या बदल रहा है और कहां सुधार की जरूरत है।
इनमें से हर चीज अलग-अलग देखने पर छोटी या बहुत तकनीकी लग सकती है। लेकिन जब ये सब साथ मिलकर काम करते हैं, तभी संगठन बढ़ने के साथ मजबूत भी होता है। वरना संगठन सिर्फ बड़ा होता जाता है और एक समय के बाद वही बढ़ता हुआ काम उसके लिए बोझ बन सकता है।
हमारे सेक्टर में बढ़ने को तैयारी से ज्यादा महत्व मिलता है
एक बड़ी समस्या यह है कि हमारे सेक्टर में संगठन को पहले से मजबूत बनाने वाली चीजों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। फंडर अक्सर प्रोग्राम और उसके नतीजों को देखते हैं। NGOs समुदाय की जरूरतों को पूरा करने और संगठन को चलाए रखने में लगे रहते हैं। बीच की संस्थाएं संगठनों को फंडिंग से जोड़ने का काम करती हैं। हर कोई ऐसी चीज पर ध्यान दे रहा है जिसे PPT या रिपोर्ट में आसानी से दिखाया जा सके।
लेकिन संगठन खुद कितना तैयार है, यह सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है। शायद यही वजह है कि संगठन की मजबूती की बात तब होती है, जब कोई समस्या पहले ही सामने आ चुकी होती है। संस्थापक अचानक संगठन छोड़ देता है। कोई बड़ा फंड खत्म हो जाता है। रिपोर्टिंग में दिक्कत आने लगती है। टीम थक जाती है। तब संगठन को मजबूत करने की कोशिश शुरू होती है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। मजबूत सिस्टम और अच्छी तैयारी किसी संकट के बाद नहीं, संकट आने से पहले बनानी चाहिए।
हमें यह सवाल पहले पूछना चाहिए: “किसी संगठन को कितनी फंडिंग चाहिए?” से पहले, “क्या संगठन इस फंडिंग को सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए तैयार है?” और जब कोई संगठन बढ़ रहा हो, तो सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि उसके प्रोग्राम कितने बढ़े।
यह भी देखना चाहिए कि क्या संगठन खुद भी उनके साथ मजबूत हो रहा है? क्योंकि सबसे ज्यादा असर करने वाले संगठन हमेशा सबसे ज्यादा फंड पाने वाले संगठन नहीं होते। वे ऐसे संगठन होते हैं जो हर नए मौके के साथ थोड़ा और मजबूत होते जाते हैं। वे ऐसी संस्था बनाते हैं जो किसी एक फंड, किसी एक प्रोग्राम या किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहती। और यही असली मजबूती है।
मजबूती विकास के बाद नहीं आती। मजबूती ही विकास को टिकाऊ बनाती है।